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Showing posts from November, 2018
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गंगटोक आते हुए कलिमपोंग जिले में यह दीवार पर बना उत्किर्नन दिखा। गोरखा संस्कृति की अलग पहचान हेतु समिति द्वारा निर्मित है।गोरखा पहचान का रोचक इतिहास है।गोरखा शब्द की उत्पत्ति गौ +रक्षा से हुई। (नेपाल में कुछ साल पहले तक गौ हत्या की सजा फांसी थी )गुरु गोरक्षनाथ या गोरखनाथ को नेपाल में राष्ट्र संत माना जाता है।इन्हीं के अनुयायियों ने नेपाल में गोरखा राज्य की स्थापना की । गोरखपुर शहर का नाम भी गुरु   गोरखनाथ के नाम पर है।गोरखा के राजा प्रथ्वी नारायण शाह के नेतृत्व में नेपाल के एकीकरण की शुरुआत हुई।गोरखा राज्य का विस्तार हिमाचल, सिक्किम, उत्तराखंड तक हुआ।सुगौली की सन्धि के बाद दार्जिलिंग, जो नेपाल का हिस्सा था ब्रिटिश इंडिया में मिला लिया गया। अब यह पश्चिम बंगाल का एक हिस्सा है।बंगाल में उपेक्षित महसूस करने पर भारतीय गोरखाओ ने गोरखालैंड का आंदोलन शुरू किया। अभी गोरखा शब्द का प्रयोग मूलत राई,लिम्बु,मगर, तमांग,ठाकुरी ,छेत्री, सुनुवार जाति के लोगों के लिए किया जाता है।परम्परागत गोरखा सैनिक भी इन्हीं जातियों से आते हैं।

book BY mahesh regmi

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महेश रेगमी की लिखी किताब इंपीरियल गोरखा ,इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं ---नेपालियों के कुमाऊं पर कब्जे (१७९१_१८१५)के दौरान शासन से संबंधित है।इस का सबसे रोचक हिस्सा है कि किस प्रकार काठमांडू से पूरे उत्तराखंड का शासन चलाया जाता था ।८०० किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए पहाड़ी नदियों पर तार के पुल बनाए गए ।संदेश भेजने के लिए हरकारे ४घंटे पूरे जोर से भागते थे, फिर अगली पोस्ट पर ताजा दम हरकारा बैटन ल े लेता था।८०० किलोमीटर की इस ट्रेल को हर साल बनाना पड़ता था।बरसात में हालत खराब हो जाती थी। गोरखा लोगो को गुरु गोरखनाथ का आशीर्वाद मिला हुआ है कि वो पूरा हिमालय जीत लेंगे,इस अफवाह का असर उत्तराखंडी लोगो पर कैसा पड़ा।कांगड़ा का घेरा बहुत लंबा चला था।।इसका भी जिक्र है ।सबसे रोचक पक्ष है बहुत से लोगो को कर न देने के कारण या विद्रोह करने के कारण अछूत घोषित कर दिया गया।अशुद्ध गोरखा सैनिकों(मगर,गुरुंग) की उत्तराखंडी ब्राह्मण ,राजपूत लड़कियों से विवाह की प्रथा को कैसे रोका गया।गोरखाओ का लक्ष्य कश्मीर विजय था जो सुगोली की संधि के बाद ख़तम हो गया।राजा प्रथ्वी नारायण शाह के नेपाली एकीकरण की कहानी का ...