book BY mahesh regmi

महेश रेगमी की लिखी किताब इंपीरियल गोरखा ,इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं ---नेपालियों के कुमाऊं पर कब्जे (१७९१_१८१५)के दौरान शासन से संबंधित है।इस का सबसे रोचक हिस्सा है कि किस प्रकार काठमांडू से पूरे उत्तराखंड का शासन चलाया जाता था ।८०० किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए पहाड़ी नदियों पर तार के पुल बनाए गए ।संदेश भेजने के लिए हरकारे ४घंटे पूरे जोर से भागते थे, फिर अगली पोस्ट पर ताजा दम हरकारा बैटन ले लेता था।८०० किलोमीटर की इस ट्रेल को हर साल बनाना पड़ता था।बरसात में हालत खराब हो जाती थी। गोरखा लोगो को गुरु गोरखनाथ का आशीर्वाद मिला हुआ है कि वो पूरा हिमालय जीत लेंगे,इस अफवाह का असर उत्तराखंडी लोगो पर कैसा पड़ा।कांगड़ा का घेरा बहुत लंबा चला था।।इसका भी जिक्र है ।सबसे रोचक पक्ष है बहुत से लोगो को कर न देने के कारण या विद्रोह करने के कारण अछूत घोषित कर दिया गया।अशुद्ध गोरखा सैनिकों(मगर,गुरुंग) की उत्तराखंडी ब्राह्मण ,राजपूत लड़कियों से विवाह की प्रथा को कैसे रोका गया।गोरखाओ का लक्ष्य कश्मीर विजय था जो सुगोली की संधि के बाद ख़तम हो गया।राजा प्रथ्वी नारायण शाह के नेपाली एकीकरण की कहानी का पक्ष यह है कि उससे पहले नेपाल सिर्फ काठमांडू घाटी को कहा जाता है।जुमला इत्यादि के राजाओं ने तो इस का काफी प्रतिरोध किया।गोरखा शब्द गुरु गोरखनाथ मठ के अनुयाई से आया है (योगी आदित्यनाथ वाला गोरखधाम)इस दौरान गुलाम बना कर मैदानों में बेचने की प्रथा पहले से ही उत्तराखंड में थी।जिसे गोरखा राज में बढ़ावा मिला।और लगभग डेढ़ लाख उत्तराखंडी गुलाम बना के बेचे गए।ब्राह्मणों और राजपूतों और गुलाम नहीं बनाया जाता था। लिम्बु, राई जैसी नेपाल की मूल जातियों ने कैसे गोरखा आधिपत्य के खिलाफ तिब्बत का साथ दिया।(नेपाल के अधिकांश राजपूत ,ब्राह्मण भारत से ही सैकड़ों साल तक चलने वाले प्रवास में वहां गए।)


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