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पुस्तक समीक्षा-नेपाल यात्रा-लेखक भंते धर्म रक्षित-

पुस्तक समीक्षा-नेपाल यात्रा-लेखक भंते धर्म रक्षित-भारतीय बौद्ध भिक्षु भंते धर्म रक्षित ने 1948 में नेपाल की यात्रा की थी और संस्मरण को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया।1948 में हुई इस यात्रा का वर्णन काफी रोचक है।उस समय नेपाल जाने के लिए सड़क नही थी।भीमफ़ेदी तक मोटर से जाते थे उसके बाद पैदल पहाड़ी यात्रा करनी पड़ती थी जो बहुत दुष्कर होती थी।जो लोग चल नही सकते थे उनके लिए भारी(ढोने वाले)होते थे। विदेशियों को नेपाल में जाने के लिए राहदानी(वीजा)की जरूरत होती थी।भारतीयों को भी।काठमांडू में घुसते ही यात्रियों के को नेपाल सरकार की तरफ से मालपुए नामक मिठाई खिलाई जाती थी।उस समय काठमांडू बहुत गंदा शहर था।ज्यादातर मकान दुमंजिले थे।मजदूर का मकान भी काठमांडू में दुमंजिला होता था।बौधों के घर के बाहर बुद्ध के चित्र और शैवों के घर के बाहर तोता मैना इत्यादि के चित्र बने होते थे।उस समय नेपाल में आर्थिक भरस्टाचार बहुत ज्यादा था।पूरे देश मे हाईस्कूल सिर्फ 2 थे ।पुस्तकालय बनाने की अनुमति नही थी।सरकार कोशिश करती थी कि लोग अनपढ रहें।इस किताब में यह भी वर्णन है कि हवेनत्सांग जब नेपाल आया तो उसने कांतिपुर(काठमां...

Arnico -Nepal,s cultural ambassador In China

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कुछ कलाकर इतिहास में अमर हो जाते हैं। ऐसा ही कलाकार था अरनि को। १२ वी शताब्दी में अरनिको नेपाल के पाटन इलाके में पैदा हुआ था। मात्र १७ साल की उम्र में वो ७० कलाकारों के दल को लेकर तिब्बत कुछ बौद्ध मठो में चित्रकारी करने और]निर्माण करने गया। वहां से उसे चंगेज खान के पौत्र चीन के राजा कुबलाई खान ने उसे पेइचिंग [चीन की राजधानी ] बुला लिया। अरनिको चीन में आजीवन रहा और उसने वहां पेइचिंग का मशहूर श्वेत पैगोडा बनाया , कुबलाई खान का प्रसिद्ध चित्र भी अरनिको ने ही बनाया। अरनिको ,आजीवन चीन में ही रहा.अरनिको के बारे में नेपाल के इतिहास में कोई भी जानकारी नहीं मिलती। जो भी उसके विषय में पता चला है वो चीनी अभिलेखों से। अरनिको नेवार जाति का था। अरनिको जिस रस्ते से तिब्बत गया था अब उसे रस्ते को चौड़ा करके अरनिको हाइवे बना दिया गया है। अरनिको नेपाल -चीन मैत्री का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है इसलिए इस काठमांडू से लहासा हाइवे का नाम उसके नाम पर रखा गया।[पिछले साल मैं मोटरसाईकल इस हाईवे द्वारा नेपाल चीन सीमा तक गया था ]पेइचिंग के वर्जित प्रासाद के मंदिर में नेपाली भूषा में अरनिको की प्रतिमा लगी हुयी ...

Roads of Nepal

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नेपाल में सड़के या तो खराब हैं या बहुत अच्छी हैं।मेरा मानना है कि नेपाल के हाइवे भारत से बेहतर हैं जो भी है या तो खराब है अगर हाइवे है तो गड्ढे नही है जैसे अचानक गड्ढे यहां भारत के हाईवे में मिलते हैं।मैं नेपाल की खराब सड़को पर ही मोटरसाईकल चलाने गया था क्योंकि वह ज्यादा चुनोतिपूर्ण है।बेहतर सड़को पर तो कोई भी चल सकता है।जब मुझे पता चला कि जिला mustang जिला में सड़क कुछ बेहतर हो गयी तो वहां जाने का मेरा आधा आकर्षण ही खत्म हो गया।हम जैसे 1,2 बार जाने वालों के लिए ये खराब सड़के आकर्षण हैं लेकिन वहां के निवासियों के दुःस्वप्न।लेकिन इन दूरस्थ पहाड़ी इलाको को सड़क से जोड़ना भी बहुत मुश्किल एवम खर्चीला है नेपाल जैसे संसाधन में कमजोर राष्ट्र के लिए।पहले कई कई दिन लोग पैदल चलके अपने गांव पहुंचते थे।भारत मे भी कुछ गांब ऐसे हैं।नेपाल के कुल 77 जिलों में अभी 2 जिले ऐसे बचे हैं जहां 1 किलोमीटर भी मोटरेबल सड़क नही है।भारत के लेह ,स्पीति ,पांगी घाटी के रुट कुछ नहीं इनके सामने ,उन पर बच्चे भी गाडी चला सकते हैं ,.जिसे अपनी ड्रायविंग स्किल या राइडिंग स्किल को टेस्ट करना हो मुगु, मनाग या mustang जाए अपनी गाड़ी ले...

Nalapani monument ...

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नेपाल = किरात राजा यालम्बर=।महाभारत

लगभग 5 हजार से ज्यादा पेज की महाभारत पीडीएफ मिल गयी है।पूरी पढ़ने का इरादा है।महाभारत न केवल एक।धार्मिक ,पौराणिक ग्रन्थ है बल्कि इसमें कई अदभुत जानकारियां हैं। महाभारत में किरात(नेपाल एवम अन्य इलाको के मंगोलायड, pashtun )जैसे समुदायों का भी वर्णन है।महाभारत के युद्ध में भाग लेने नेपाल से किरात राजा यालम्बर आया था,जब श्रीकृष्ण को पता चला कि यालम्बर महायौधा है और उसने निश्चय किया है कि वो हारने वाले का साथ देगा तो श्रीकृष्ण ने उसे मार दिया।हमारे इलाके पश्चिमी उत्तर प्रदेश के म ुज़फ़्फ़रनगर ,मेरठ जिलों में महाभारत कालीन कई गाँव है जो उसी नाम से या बदले नाम से अभी भी है।बड़ौत वाले रास्ते में बरनावा नामक गाँव ,vrnavrit का अवशेष है जहाँ लाक्षा गृह था।वहां एक लंबी सुरंग अभी भी है।हस्तिनापुर अब एक 25 हजार की आबादी का मेरठ जिले में छोटा क़स्बा है।3 जैन तीर्थंकरों का जन्म हस्तिनापुर में ही हुआ। जहाँ पहली बार श्री मदभागवत की कथा सुनाई गयी वह जगह शुक्रताल अभी भी है।जिस वट वृक्ष के नीचे सुनाई गयी वो हजारो साल पुराना वट वृक्ष शुक्रताल जिला मुज़फ्फरनगर में अभी भी है।जहाँ राजा परीक्षित को तक्षक नामक सर्प के ...
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गंगटोक आते हुए कलिमपोंग जिले में यह दीवार पर बना उत्किर्नन दिखा। गोरखा संस्कृति की अलग पहचान हेतु समिति द्वारा निर्मित है।गोरखा पहचान का रोचक इतिहास है।गोरखा शब्द की उत्पत्ति गौ +रक्षा से हुई। (नेपाल में कुछ साल पहले तक गौ हत्या की सजा फांसी थी )गुरु गोरक्षनाथ या गोरखनाथ को नेपाल में राष्ट्र संत माना जाता है।इन्हीं के अनुयायियों ने नेपाल में गोरखा राज्य की स्थापना की । गोरखपुर शहर का नाम भी गुरु   गोरखनाथ के नाम पर है।गोरखा के राजा प्रथ्वी नारायण शाह के नेतृत्व में नेपाल के एकीकरण की शुरुआत हुई।गोरखा राज्य का विस्तार हिमाचल, सिक्किम, उत्तराखंड तक हुआ।सुगौली की सन्धि के बाद दार्जिलिंग, जो नेपाल का हिस्सा था ब्रिटिश इंडिया में मिला लिया गया। अब यह पश्चिम बंगाल का एक हिस्सा है।बंगाल में उपेक्षित महसूस करने पर भारतीय गोरखाओ ने गोरखालैंड का आंदोलन शुरू किया। अभी गोरखा शब्द का प्रयोग मूलत राई,लिम्बु,मगर, तमांग,ठाकुरी ,छेत्री, सुनुवार जाति के लोगों के लिए किया जाता है।परम्परागत गोरखा सैनिक भी इन्हीं जातियों से आते हैं।

book BY mahesh regmi

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महेश रेगमी की लिखी किताब इंपीरियल गोरखा ,इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं ---नेपालियों के कुमाऊं पर कब्जे (१७९१_१८१५)के दौरान शासन से संबंधित है।इस का सबसे रोचक हिस्सा है कि किस प्रकार काठमांडू से पूरे उत्तराखंड का शासन चलाया जाता था ।८०० किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए पहाड़ी नदियों पर तार के पुल बनाए गए ।संदेश भेजने के लिए हरकारे ४घंटे पूरे जोर से भागते थे, फिर अगली पोस्ट पर ताजा दम हरकारा बैटन ल े लेता था।८०० किलोमीटर की इस ट्रेल को हर साल बनाना पड़ता था।बरसात में हालत खराब हो जाती थी। गोरखा लोगो को गुरु गोरखनाथ का आशीर्वाद मिला हुआ है कि वो पूरा हिमालय जीत लेंगे,इस अफवाह का असर उत्तराखंडी लोगो पर कैसा पड़ा।कांगड़ा का घेरा बहुत लंबा चला था।।इसका भी जिक्र है ।सबसे रोचक पक्ष है बहुत से लोगो को कर न देने के कारण या विद्रोह करने के कारण अछूत घोषित कर दिया गया।अशुद्ध गोरखा सैनिकों(मगर,गुरुंग) की उत्तराखंडी ब्राह्मण ,राजपूत लड़कियों से विवाह की प्रथा को कैसे रोका गया।गोरखाओ का लक्ष्य कश्मीर विजय था जो सुगोली की संधि के बाद ख़तम हो गया।राजा प्रथ्वी नारायण शाह के नेपाली एकीकरण की कहानी का ...